नोएडा। देश के सबसे चर्चित और विवादित प्राधिकरणों में शुमार नोएडा प्राधिकरण एक बार फिर सवालों के घेरे में है। जिन अधिकारियों के तबादले हो चुके थे, उनकी रिलीविंग प्रक्रिया अचानक रोक दिए जाने से प्राधिकरण के गलियारों में चर्चाओं का बाजार गर्म है। सवाल उठ रहा है कि आखिर ऐसा कौन सा दबाव या हित है, जिसके चलते ट्रांसफर आदेशों पर अमल नहीं हो पा रहा?
नोएडा प्राधिकरण का नाम पहले भी भ्रष्टाचार के आरोपों को लेकर सुर्खियों में रहा है। भारत के सर्वोच्च न्यायालय तक ने समय-समय पर प्राधिकरण की कार्यप्रणाली पर सख्त टिप्पणियां की हैं। इसके बावजूद व्यवस्था में पारदर्शिता लाने के बजाय कई फैसले अब भी सवालों के घेरे में दिखाई दे रहे हैं।
भ्रष्टाचार रोकने के लिए बनी थी ट्रांसफर नीति
नोएडा में वर्षों तक एक ही विभाग और एक ही सीट पर जमे अधिकारियों को हटाने के लिए ट्रांसफर नीति लागू की गई थी। इसका उद्देश्य प्रशासनिक पारदर्शिता बढ़ाना और लंबे समय से जमे अधिकारियों के प्रभाव को खत्म करना था। माना गया था कि इससे भ्रष्टाचार पर भी अंकुश लगेगा।
लेकिन अब जिन अधिकारियों का तबादला हो चुका है, उनकी रवानगी रुकने से पूरे मामले पर सवाल उठ रहे हैं। क्या कुछ प्रभावशाली अधिकारी अपने पदों को बचाने में सफल हो गए हैं? क्या ट्रांसफर आदेश सिर्फ कागजों तक सीमित रह गए हैं?
विधायक पंकज सिंह से की मांग
नोएडा सिटीजन फोरम के महासचिव प्रशांत त्यागी वत्स ने मांग की है कि विधायक पंकज सिंह इस पूरे मामले में हस्तक्षेप करें और सरकार को लिखित शिकायत भेजकर यह स्पष्ट कराएं कि आखिर तबादलों पर रोक क्यों लगी हुई है।
उन्होंने कहा कि यदि ट्रांसफर-पोस्टिंग के खेल पर रोक नहीं लगी तो भ्रष्टाचार के खिलाफ बनाई गई पूरी व्यवस्था सवालों के घेरे में आ जाएगी।
जनता पूछ रही है—तबादले हुए तो रिलीविंग क्यों नहीं?
नोएडा के नागरिकों के बीच चर्चा है कि जब सरकार ने तबादले कर दिए तो अधिकारियों को कार्यमुक्त करने में देरी क्यों हो रही है? क्या कोई अदृश्य ताकत इन आदेशों को रोक रही है? या फिर यह ट्रांसफर-पोस्टिंग के नाम पर चल रहे किसी बड़े खेल का हिस्सा है?
अब निगाहें शासन और जनप्रतिनिधियों पर टिकी हैं। यदि जल्द स्थिति स्पष्ट नहीं हुई तो यह मामला आने वाले दिनों में बड़ा राजनीतिक और प्रशासनिक मुद्दा बन सकता है।


