नोएडा में किसान राजनीति पर बड़ा सवाल: क्या इस बार निकलेगा समाधान या फिर होगा वही पुराना खेल? बार-बार के अधूरे आंदोलनों ने खड़े किए शर्मनाक सवाल!; पढ़े पूरी खबर

दीप चौधरी, नोएडा। भारतीय किसान परिषद के बैनर तले गुरुवार को एक बार फिर नोएडा में किसानों ने अपनी लंबित मांगों को लेकर बड़ा प्रदर्शन किया। सेक्टर-6 स्थित हरौला बारात घर से पैदल मार्च करते हुए किसान नोएडा प्राधिकरण पहुंचे और मुख्य गेट पर टेंट लगाकर धरना शुरू कर दिया। बड़ी संख्या में महिला किसान भी प्रदर्शन में शामिल रहीं। किसानों ने मुआवजा, विकसित भूखंड और रोजगार की मांग को लेकर जमकर नारेबाजी की। लेकिन गौतमबुद्ध नगर की राजनीति और किसान आंदोलनों को करीब से देखने वाले लोग अब एक बड़ा सवाल पूछ रहे हैं — आखिर हर बार किसान आंदोलन “आर-पार” की बात से शुरू होकर कुछ दिनों बाद शांत क्यों हो जाता है?

“हक लेकर ही हटेंगे”… फिर अचानक खत्म हो जाता है आंदोलन

गौतमबुद्ध नगर में पिछले कई वर्षों से अलग-अलग किसान संगठन अपनी मांगों को लेकर धरना-प्रदर्शन करते रहे हैं। हर बार मंच से बड़े ऐलान होते हैं कि “जब तक हक नहीं मिलेगा, आंदोलन खत्म नहीं होगा”, लेकिन कुछ समय बाद धरना समाप्त हो जाता है और मुद्दे फिर अधर में लटक जाते हैं। स्थानीय लोगों और राजनीतिक हलकों में अब यह चर्चा तेज हो गई है कि क्या किसान आंदोलनों की रणनीति केवल दबाव बनाने तक सीमित रह जाती है या फिर पर्दे के पीछे कोई समझौते भी होते हैं।

किसानों की क्या हैं प्रमुख मांगें?

प्रदर्शन कर रहे किसानों का कहना है कि उनकी जमीन अधिग्रहित की गई, लेकिन उन्हें अब तक उचित मुआवजा और वादे के अनुसार सुविधाएं नहीं मिलीं। किसान 10 प्रतिशत विकसित भूखंड, 5 प्रतिशत अतिरिक्त भूखंड या बराबर मुआवजा, 64.7 प्रतिशत की दर से मुआवजा और गांवों की आबादी को यथावत रखने की मांग कर रहे हैं। किसानों का आरोप है कि प्राधिकरण उनकी आबादी की जमीन को अवैध बताकर ग्रामीणों को परेशान कर रहा है।

हाईपावर कमेटी बनी, रिपोर्ट आज तक गायब

किसानों ने यह भी आरोप लगाया कि समस्याओं के समाधान के लिए करीब दो साल पहले हाईपावर कमेटी बनाई गई थी, लेकिन उसकी रिपोर्ट अब तक सार्वजनिक नहीं की गई। सुखबीर खलीफा ने कहा कि अधिकारियों की तरफ से केवल आश्वासन दिए जा रहे हैं, जमीन पर कोई समाधान नहीं दिख रहा।

दूसरा बड़ा सवाल — क्या आंदोलन के पीछे निजी स्वार्थ भी?

किसान आंदोलनों को लेकर अब दूसरा बड़ा सवाल भी उठने लगा है। शहर के राजनीतिक और सामाजिक हलकों में चर्चा है कि क्या कुछ आंदोलनकारी नेताओं के अपने निजी हित भी इन आंदोलनों से जुड़े हैं। क्योंकि कई बार आंदोलन अचानक खत्म हो जाते हैं, लेकिन आम किसानों की समस्याएं जस की तस बनी रहती हैं। हालांकि किसान संगठन इन आरोपों को सिरे से खारिज करते हैं और कहते हैं कि उनका संघर्ष पूरी तरह किसानों के अधिकारों के लिए है।

प्रशासन और किसानों के बीच भरोसे का संकट

लगातार धरना-प्रदर्शन और अधूरे आश्वासनों के बीच अब सबसे बड़ा संकट भरोसे का बनता जा रहा है। किसान प्रशासन पर वादाखिलाफी का आरोप लगा रहे हैं, जबकि दूसरी तरफ आम लोग सवाल कर रहे हैं कि यदि आंदोलन इतने गंभीर हैं तो उनका स्थायी समाधान क्यों नहीं निकल पा रहा। फिलहाल नोएडा में किसानों का आंदोलन एक बार फिर चर्चा में है, लेकिन शहर की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि यह आंदोलन भी पहले की तरह कुछ दिनों में शांत होगा या इस बार कोई ठोस नतीजा निकलेगा।

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