नोएडा । उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव भले अभी कुछ समय दूर हों, लेकिन राजनीतिक दलों ने अपनी तैयारियां तेज कर दी हैं। नोएडा में भारतीय जनता पार्टी लगातार बूथ स्तर तक संगठन को मजबूत करने में जुटी है। हैरानी की बात यह है कि जिस सीट पर समाजवादी पार्टी को सबसे अधिक संघर्ष और सक्रियता दिखाने की जरूरत है, वहीं पार्टी की मौजूदगी आम जनता के बीच बेहद सीमित नजर आ रही है। जनसरोकारों के मुद्दों पर सपा की आवाज उतनी मुखर दिखाई नहीं दे रही, जितनी एक प्रमुख विपक्षी दल से अपेक्षित होती है।
सपा की गतिविधियां सीमित होने के आरोप
महंगाई, बिजली दरों में बढ़ोतरी, स्थानीय समस्याएं, प्राधिकरण से जुड़े विवाद और आम नागरिकों की परेशानियां ऐसे मुद्दे हैं जिन पर विपक्ष को सरकार को घेरने का अवसर मिलता है। लेकिन नोएडा में समाजवादी पार्टी की ओर से बड़े जनआंदोलन या प्रभावी विरोध प्रदर्शन कम ही देखने को मिले हैं। दूसरी ओर भाजपा लगातार जनता के बीच अपनी पकड़ मजबूत करने में लगी हुई है। यही कारण है कि राजनीतिक गलियारों में यह सवाल उठने लगा है कि आखिर नोएडा में सपा की रणनीति क्या है।
कार्यकर्ताओं में बढ़ रही है बेचैनी
पार्टी कार्यकर्ताओं के बीच भी निराशा की चर्चाएं सुनाई देने लगी हैं। कई कार्यकर्ताओं का मानना है कि संगठन को सड़क पर उतरकर जनता के मुद्दे उठाने चाहिए। यदि कार्यकर्ताओं को नेतृत्व और दिशा नहीं मिलेगी तो उनका मनोबल प्रभावित होना स्वाभाविक है। चुनाव केवल सोशल मीडिया और बैठकों से नहीं जीते जाते, बल्कि जनता के बीच लगातार सक्रिय रहने से राजनीतिक जमीन तैयार होती है।
समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव प्रदेशभर में पार्टी को मजबूत करने की कोशिशों में जुटे हैं, लेकिन नोएडा जैसे महत्वपूर्ण शहर में संगठन की निष्क्रियता पार्टी नेतृत्व के लिए भी चिंता का विषय बन सकती है। यदि समय रहते संगठन में नई ऊर्जा नहीं भरी गई और जनता के मुद्दों पर आक्रामक राजनीति नहीं की गई, तो 2027 का चुनाव सपा के लिए और अधिक चुनौतीपूर्ण साबित हो सकता है।






