नोएडा/ग्रेटर नोएडा। पांच और छह प्रतिशत आबादी भूखंड का मुद्दा एक बार फिर सुर्खियों में है, लेकिन किसानों का दर्द वही पुराना है—वादा, बैठक, आश्वासन और फिर सन्नाटा। हजारों किसान वर्षों से अपने हक के भूखंड की प्रतीक्षा कर रहे हैं, जबकि प्राधिकरण और सरकार की ओर से बार-बार जल्द आवंटन का भरोसा दिया जाता रहा है। अब किसानों के बीच यह चर्चा तेज हो गई है कि आखिर भूखंड देने का दावा करने वाले अधिकारी और नेता हर बार एक ही बात क्यों दोहराते हैं, जबकि जमीन पर कोई बदलाव दिखाई नहीं देता।
आंदोलन खत्म कराने का जरिया बन गए आश्वासन?
किसानों का आरोप है कि जब भी वे धरना-प्रदर्शन करते हैं या किसी बड़े जनप्रतिनिधि के सामने अपनी मांग रखते हैं, तब प्राधिकरण के अधिकारी जल्द भूखंड आवंटन का आश्वासन देकर मामला शांत करा देते हैं। आंदोलन समाप्त होते ही फाइलें फिर ठंडे बस्ते में चली जाती हैं।
कई किसान नेताओं का कहना है कि पिछले एक दशक में दर्जनों बार ऐसी बैठकें हुईं, जिनमें भूखंड देने की घोषणा हुई, लेकिन अधिकांश किसानों के हिस्से में सिर्फ तारीखें और इंतजार ही आया। सवाल यह उठ रहा है कि यदि भूखंड आवंटन की प्रक्रिया वास्तव में चल रही है, तो हजारों किसानों को अब तक उनका अधिकार क्यों नहीं मिला?
“अगले महीने मिलेगा प्लॉट”… 23 साल से नहीं आया वह महीना
साकीपुर गांव के किसान दीपक भाटी की कहानी हजारों किसानों की हकीकत बयां करती है। उनका कहना है कि वर्ष 2003 में उनकी जमीन अधिग्रहित हुई थी और तब से लेकर आज तक उन्हें आबादी भूखंड नहीं मिला। उन्होंने कई बार अधिकारियों से मुलाकात की, लेकिन हर बार एक ही जवाब मिला—“अगले महीने काम हो जाएगा।”
किसानों का कहना है कि यह “अगला महीना” अब दो दशक से ज्यादा लंबा हो चुका है। उनका आरोप है कि फाइलें ऊपर से मंजूर होने की बात कही जाती हैं, लेकिन नीचे स्तर पर उन्हें रोक दिया जाता है।
सबसे बड़ा सवाल: जब जमीन नहीं है तो वादे क्यों?
प्राधिकरण के भीतर से जुड़े सूत्रों की मानें तो सबसे बड़ा संकट जमीन की उपलब्धता का है। कई गांवों में किसानों को देने योग्य भूखंडों के लिए पर्याप्त भूमि नहीं बची है। अच्छी लोकेशन वाले अधिकांश प्लॉट पहले ही आवंटित किए जा चुके हैं।
यहीं से किसानों के सवाल और तीखे हो जाते हैं—
- यदि भूखंड देने के लिए जमीन नहीं है तो हर बैठक में आवंटन का वादा क्यों किया जाता है?
- अगर फाइलें तैयार हैं तो उन्हें रोक कौन रहा है?
- जब सामान्य किसानों को वर्षों से भूखंड नहीं मिल रहे, तो प्रभावशाली लोगों के आवंटन कैसे हो जाते हैं?
- क्या नियोजन विभाग इस पूरी प्रक्रिया की सबसे कमजोर कड़ी बन चुका है?
नेताओं की मौजूदगी में भी नहीं बदल रही तस्वीर
किसानों का कहना है कि कई बार सांसद, विधायक और मंत्री स्तर तक यह मुद्दा पहुंच चुका है। बैठकों में वरिष्ठ अधिकारी सकारात्मक रुख दिखाते हैं, लेकिन उसके बाद स्थिति जस की तस बनी रहती है। इससे किसानों के बीच यह धारणा मजबूत हो रही है कि निर्णय लेने और उसे लागू करने के बीच कहीं न कहीं सिस्टम की इच्छाशक्ति कमजोर पड़ रही है।
हजारों किसानों का धैर्य टूटने की कगार पर
नोएडा और ग्रेटर नोएडा के दर्जनों गांवों में आबादी भूखंड का मुद्दा अब सिर्फ जमीन का नहीं, बल्कि विश्वास का संकट बनता जा रहा है। किसान पूछ रहे हैं कि यदि सरकार और प्राधिकरण वास्तव में भूखंड देना चाहते हैं तो एक स्पष्ट समयसीमा घोषित क्यों नहीं की जाती? और यदि कोई बाधा है तो उसे सार्वजनिक क्यों नहीं किया जाता?
जब तक इन सवालों का जवाब नहीं मिलता, तब तक किसानों के बीच यह धारणा बनी रहेगी कि आबादी भूखंड का सपना फाइलों में जिंदा है, जमीन पर नहीं।


